साहित्यिकों के पत्र

(उन की अपनी लिखावट में)

संग्रही भर सम्पादक पं० किशोरीदास वाजपेयी

सकाशक

हिमालय एजेन्सी, कनखल (छ० प्र0)

प्रकाशक हिमालय एजेन्सी, कनखल (3० प्र०)

प्रथम सस्करण १६५८ मूल्य दो रुपए

सर्वाधिकार सुरक्षित

मुद्रकः ज्ञानेन्द्र शर्मा जनवाणी प्रिण्टर्स एण्ड पब्लिशसं प्राइवेट लि० ३६, वाराणसी घोष स्ट्रीट, कलकत्ता-७

प्रासंगिक निवेदन

अति दुरूह विस्तृत जीवन जो,

ग्रन्यो में है नहीं समाता; वही किसी के एक पत्र में,

ज्यो का त्यों पूरा बँध जाता!

सम्मेलन-संग्रहालय, के (पाण्डुलिपि-विभाग के) श्धिकारी श्री वाचस्पति गेरोला को ब्लाक बनवा कर भिजवा देने का काम में सोप झ्राया था झोर शोष पत्रों को टकित कराने-भेजने का भी काम दोनो काम उन्हों ने कर दिए ; इस लिए धन्यवाद ब्लाक बनाने के लिए भाई गरोता जी ने ग्रपती रुचि के प्रनुसार काड स्वेच्छा से छोटे है। फितने ही स्वर्गीय तया जीवित साहित्पिकों के कार्डों के ब्लाक नहीं बन पाए है, जिन के बिना इस चीज में वट्टा लग गया है--उपया पतन्द्रह भाने का हो रह गया है! पर चलो, पन्चह झ्ाने तो सामने भाए धागे यह धाटा भी पूरा हो जाए गा, व्याज भी लग जाएगा। टंकित पत्रों का उपयोग दूसरी तरह से भ्रागे हो गा।

कनखल (3० प्र०) १४५।८।श्८

“किशोरोीदास वाजपेयी

आचाय॑ द्विवेदी

साहित्यिकों के पत्र

हिन्दी - सरस्वती वन्‍्दे, महावीर मानिनम्‌

यत्प्रसादाद्‌ वय प्राप्ताः, नवीना युग-चेतनाम्‌

श्राचार्य प० महावीर प्रसादजी द्विवेदी हिन्दी के युग-निर्माता हूँ द्विवेदीजी ने हिन्दी में सम्पादन-फला फा प्रवर्तन श्रौर परिष्कार फिया। सन्‌ १६०१ से पहले की सामयिक पत्रिकाएँ देख लीजिए, फंसी था ! इस से पहले फी सरस्वतो' ही देस लीजिए

ग्राचायं द्विवेदी ने साहित्य फम, साहित्यिफ श्रधिक पंदा किए। इस युग फे बडें-से-व्ड लेखक, महाकवि शभ्रीर प्राचार्य उन्हीं के बनाए हे नागरी प्रचारिणी सभा (काशी) में सुरक्षित सरस्वती फी पाण्डुलिपियो फो देखने से पता चलता है कि हिन्दी के इस महान्‌ ऋषि ने क्या फुछ किया है

इस के श्रतिरिक्त, श्राचायं द्विवेदी ने श्रपने विशुद्ध श्रौर कर्मठ जीवन से हमें गाहेसस्‍्थ्य की शिक्षा दी है , स्त्री-जगत्‌ का सम्मान करना सिखाया है, ग्राम-सेवा में तो वे महात्मा गान्वी फे भी पय-प्रदर्शक हुए , कठिन परिश्रम फरके पंसा फमाना श्ौर साथ-साथ उसे सत्फार्य में लगाते रह कर भी कुछ-कुछ वचाते रहना श्रौर फिर सचित निधि को सुव्यवस्यित रूप से लोकोपयोगी सरसस्‍्थाग्रो फो वाँठ देना , पर साथ ही झपने श्राश्चित वहन- भानजो का भी पूरा ध्यान रखना , यह सामजस्य-बुद्धि भारतीय गृहस्थ के लिए उन फे जीवन में श्रादर्श-रूप है।

व्यवस्था-प्रिय वे ऐसे थे कि अपने कमरे में पडे मेरे घूल-घक्कड भरे जुते एक फपडे से साफ कर रहे थे , में ने श्रा कर देखा ! घबरा फर हाथ से छीन लिए, तो बोले---पहले साफ क्यो नहीं किए थे ?

भ्राचाय द्विवेदी ने भाषा-परिष्कार का बहुत काम किया। सब से पहले भाषा-शुद्धि पर उन्हों ने ही ध्यान दिया था। परन्तु सरस्वती“ सेवा से छुट्टी ले कर जब वे ग्राम-सेवन करने लगे, तो हिन्दी में फिर गडबडी

साहित्यिकों के पत्र

पैदा हुई। नए-नए काम में सतत चौकसी फी जरूरत रहती है। सन्‌ १६२१-२५ के बीच, पाँच ही वर्षों में श्रराजकता हिन्दी में फल गई | तब मेरा ध्यान इस श्रोर गया। मं ने पत्र-पत्रिकाग्रों में लिखना शुरू फिया। मेरा यह सौभाग्य कि श्राचायय द्विवेदी मेरे लेखों पर भी नजर डाल लेते थे म॑ तो उन्हें ही श्रपना श्रादर्श समज्न फर फाम फर रह था , पर फभी उन फे पास पत्र भेजने फी हिम्मत हुई परन्तु दे फंसे भूलते ? सन्‌ १६३० में उन फा पहला कार्ड मेरे नाम हरिद्वार, ऋषिकुल के पते पर भेजा हुआ मिला। में ऋषिकुल में था, हाई स्फूल में था शोर 'फ़नसखल' रहता था। सौभाग्य फी बात, फार्ड एक सज्जन ने मेरे पास पहुँचा दिया वह कार्ड ही ब्लाक फे लिए देना था, यह बात गरोला जी समझ सके ! ऐतिहासिक महत्त्व रखता है वह कार्ड उसी कार्ड फा फल है कि म॑ उत्साहवान्‌ हुआ शोर हिन्दी में श्रागें बढ कर कुछ फाम फर सका।

में ने उत्तर सें प्रभिवादन-पत्र भेजा। फिर पत्र-व्यवहार वरावर रहा श्रीर लगभग पचास पत्र श्राचार्य हिबेदी फे हाथों फे लिखे प्राप्त फरने फा सौभाग्य मुझ्ते मिला

इस कार्ड में स्फुट फा जिक्र है। में ने किसी पत्र में कुछ (गलत या गलत ध्रर्य में चलते) शब्दों पर कोई लेख लिखा था। उसी सिलसिले में श्राचार्य ने स्फुट' की याद दिलाई है।

वाच्यों फा तारतम्य में गुर जी फे व्याकरण फा खण्डन फर रहा था--वाच्य॑-प्रफरण फा। एफ शब्दशास्त्री गुरु जी के समर्थन में भागे झा गए। इन महाशय के लेख फा में ने जो पण्डन किया था, उसी सिलसिले में पक्‍्तियाँ हे

आचार्य पं० रामचन्द्र शुक्ल

साहित्यिको के पत्र

प्राचार्य पं० रामचन्द्र शक्ल ने हिन्दी में श्रालोचना तया साहित्य- इतिहास फी जो लीक खींच दी है, उस से इधर-उघर लोग श्री तक नहीं हो सके हूं ।* मं उन फे सम्पर्क में पत्र-व्यवहार से भी नहीं रहा वात यह हुई फि उन का सबन्ध सभा' से था भर मे 'सम्मेलन' में नत्यी था; राष्ट्रमापा का प्रचार फर रहा था। सभा साहित्यिक काम फर रही थी, जिस के प्रति मेरी श्रादर-भावना थी ; पर श्रग्नेजी सरकार से इसे प्राथिक सहायता मिलती थी श्रौर इसी लिए वापिक विवरण सरकार को धन्यवाद से शुरू होता था ! मुप्ते यह सह्य था। शत्रु से फिसी श्रच्छे फाम में भो मदद लेना मेरी भावना पसन्द फरती थी। सम्मेलन राजपि टढन फे सचालन में या, जिम पर तिरगा झडा फहराता रहता या, जो उस समय राष्ट्रीयता फा प्रतीक था ।. सभएं फा मे सदस्य बना, इस फी पत्रिका फो कभी फोई लेख भेजा, उत्सव में ही हाजिर हुआ। इसी लिए श्राचार्य शुक्ल तया डा० श्यामसुन्दर दास श्रादि से निकट सम्पर्क सम्भव हंग्रए

परन्तु जब मे ने ब्रजभावा-मुक्तक फाव्य तरगिणी' लिखी, तो बुद्ध- चरित' फे लेखक से भूमिका लिखाने फो इच्छा हुई भौर पत्र-व्यवहार हुमा बस, एफ ही पन्न मेरा उन की सेवा में गया श्रीर यह एक हो कार्ड उन फा मुझे प्राप्त हो सका! उन फे हस्ताक्षर हो मेरे लिए बहुत हे--भभि- वादनीय हूं

ग्राचायं शुक्ल फे पत्र में फोई भो ऐसी चीज नहों, जिस फा मुझे सुलासा करना हो

शुकत जी के प्रक्तर देसिए, जसे मोती हो प्रक्षर वरावर, लकीर वरावर, सद फुछ मोहक !

ऐसे ही प्रक्षर डा० ध्रमरनाय हा फे ये--मोतो--जैसे पें० क्ृष्ण- विहारो मिश्र फी भी ऐसी हो सुन्दर लिखावट है

ऐसी सुन्दर लिखावट फे पास घदि मेरे चेंडोल़ प्रकर रख दिए जाएं, तो ऐसा लगेगा फि चोंटे को स्याही में डुवो फर फागज पर छोड दिया

साहित्यिकों के पश्न

गया हो ! भ्रौर मुक्त से भी श्रागे हैँ प० श्रीकृष्णदत्त पालीवाल, महापण्डित राहुल साकृत्यायन, डा० सम्पूर्णानन्‍न्द जी झौर वादवू रामचन््ध वर्मा !

राजपि टडन फी भो लिखावट चहुत सुन्दर है। पर उनके फिसी फार्ड का ब्लाफ ही नहीं बना |

पत्र में फोजिएगा' ध्यान देने योग्य है, पर लोग श्रव भी 'कीजियें' चाहिये लिखते जाते है !

ग्राचार्य ने श्रव्यय लिए! लिखा है, पर नागरी-प्रचारिणी सभा' (फाशी) श्रव भी लिये को ही लिए पडी है !

प्रनुनासिक फी जगह अनुनासिकफ चिह्न ही हूं, भ्नुस्वार दे कर फाम नहीं निकाला है। लिखावट के लिए श्राददा पत्र है

महाकवि 'हरि ओऔधो

पं० ध्योध्या सिह उपाध्याय हरि झ्रीच' श्रार महाकवि श्री मैयिली- अरण गुप्त का नाम उन दिनो साथ-साथ इसी तरह चलता चा, जैसे सूर श्रोर तुलसी फा चलता है। एफ फा नाम जेने से दूसरे फा प्पने श्राप

घर साहित्यिकों के पत्र

ग्रा जाता है। में ने सब से पहले 'हरि श्रौध! जी का ठेंठ हिन्दी फा ठाट देखा श्रौर फिर 'प्रिय-प्रवास फी तो घूम ही थी। वाद में फितनी ही फविताएँ प्रकट हुई ; पर प्रिय-प्रवास' तया भोरत-भारती' का जो ग्रादर श्रीर प्रचार हुआ, भ्रत्य का नहीं

(हरि श्रीध' जी वैसे थे तो गुर नानक के श्रनुयायी , पर खान-पान में पुरे सनातनी थे। हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन फे (दिल्ली-भ्रधिवेशन के) प्रध्यक्ष बडोदा-नरेश निर्वाचित हुए थे---श्री सया जी राव गायकवाड। (इस निर्वंचन का फारण यह था उक्त महाराज ने श्रपने राज्य की राजभाषा हिन्दी घोषित फर दी थी श्रौर घोषणा को कार्य-रुप में भी परिणत फर दिया था।) परन्तु बडोदा-रेदा श्रा सके थे, इस लिए रुभापतित्व थ्रां हरि श्रौध' जी फो हो फरना पडा था। इस से पहले हरि श्रोध जी 'सम्मेलन' के निर्वाचित श्रध्यक्ष एक वार पहले भी रह चुके ये

में भी दिल्‍ली (अ्रधिवेशन पर) पहुँचा था। उसी समय अपने साहित्यिफ सन्‍्त--श्री 'हरि श्रौध! जी--फे दर्शन किए पाठोदी-हाउस में साने-पौने फा प्रबन्ध था। एक प्रनाथालय के लडके सव सेंभाल रहे थे। स्वागताध्यक्ष इद्ध जी थे। शबझ्लार्ययमाजी वातावरण था। श्री 'हरि श्रौध/ जी स्ववपाकी थे। वे जहाँ अपना भोजन बना रहे थे, जाने-आ्राने फा रास्ता भी था। लोगो को पता भी था फि कितना बचना चाहिए ! में ने देखा, श्राप बडी परेशानी में हे। मे वहीं कुर्सो श्रौर मेज इस तरह लगा कर बेठ गया कि वह रास्ता ही झुक गया। मजे से भोजन बना। इस पर ब्रह्मपि ये मुझे हादिक श्राशीर्वाद दिया-- गदगद हो कर।

'पदरास' से मतलव मदरास-सम्मेलन' से है। दूर होने के फारण में जा सका था।

'हरि श्रौध' जी श्रव्यय लिए! फो लिये लिखते थे। उन्हीं की पद्धति पर श्राज भी नागरी-प्रचारिणी सभा (फाशी) चल रही है। सच बात तो मह है कि उस समय तक “लिए-लिये' श्रादि पर विचार भी हुश्ना

साहित्यिको के पश्र &

था! दिल्ली-सम्मेलन' फे श्रवसर पर बाद गुलाब राय एम० ए० नें फहा---लिए' झ्रौर 'चाहिए' श्रादि शब्दों को फेवल स्वर से लिखना चाहिए, या य-सहित स्वर से ; इस का कोई निर्णय नहों !” मुझे यह बात लगी शरीर तब में ने इस पर घिचार किया। लेखों में श्रीर पुस्तको में विचार प्रकट फिएं। वे विचार निर्णय फी कोटि में पहुँच गए। फिर भी प्रन्धावन्धी चल रही है! उस समय तक भाजा-विज्ञान तथा भाषा- प्रकृति से पुष्ट तक फिसी से ने दिया था कि फौन-सा रूप सही औोर फोन-सा गलत है। इस लिए श्री हरि श्रोध' जेसे हिन्दी-जगत्‌ के पितामह फा लिये प्रयोग गलत नहों कहा जा सकता ; यह आ्रा्-प्रयोग' है। परन्तु जब निर्णय हो गया, उस के वाद भटकना गलती है। कानून बनने से पहले फोई प्रपराघ नहीं ; पर फानून दन जाने पर उसके विपरीत जाना श्रपराध समज्ना जाता है उस समय तो यही था--हम तो भाई, लिए लिखते हू झ्लौर हमारे यहाँ तो लिये चलता है!” फिसी औोर फोई प्रवल तक थें--थे तो सही, पर प्रकट थे, किसी ने इस सबन्ध में सोचा था !

सो, महाकवि हरि श्रीर्धा फा लिये प्रव्यय श्रार्प-प्रयोग है। दूसरा फोई ऐसा लिखे गा, तो वह गलत हो गा

डॉ० अमरनाथ शक्षा

झ्राधुनिक भारत के सारस्वत-सागर ने जो फई शप्रनमोल रत्न हमें दिए, उन में श्रन्यतम हे स्वर्गीय महामहोपाध्याय डा० गगानाथ झा सस्कृत के झ्रगाध विद्वान, भारतीय सस्कृति फे उज्ज्वल प्रतीक, विनय फी मूर्ति | प्रयाग-विश्वविद्यालय के श्राप सर्वमान्य कुलपति रहे। श्राचार्य॑ प० महावीर प्रसाद दहिवेदी का महान्‌ पश्रभिनन्‍दन-समारोह प्रयाग में सम्पन्न हुआ, तो इस समारोह-यज्ञ के प्रमुख प० लक्ष्मीघर वाजपेयी ने श्राप को (समारोह की) प्रध्यक्षता करने के लिए राजी कर लिया वेसे श्राप ऐसे सभा-समारोहो से सदा दूर रहा फरते थे

साहित्यिको के पत्र 243

इस समारोह फा उद्घाटन मह॒पि प० सदन मोहन मालवीय ने किया था। दीच में श्ाचार्य द्विवेदी श्ौर उन के उभय पाएवों में उपर्युक्त दो वन्दनोय विभूतियों फे दर्शन जिन्हें मिले, उतर सोभाग्यशालियों में इन पक्तितयों फा लेखक भी है

डा० गगानाथ झा फृतज्ञता श्रौर विनय फे झ्वतार ये मुझे हिन्दों की शोर श्राचार्य द्विवेदीजी ने ही प्रवत्त किया था ---कहते हुए जब हमारे वृद्ध-बशिप्ठ प्राचार्य द्विवेदी फे पाँव छूने के लिए झुफे झोर श्राचाय द्विवेदी ने उन के हाय बीच में ही पकड फर जिस रूप में प्रतिधिनय प्रकट फी, देखने फी चीज थी !

इन्हीं डॉ० गंगानाथ झा फे सुयोग्य पुत्र हुए डॉ० झ्मरनाय झा डॉ० भ्रमरनाय झा एक मुद्ृत तक प्रयाग-विश्वविद्यालय में श्रप्रेजी-विभाग फे भ्रध्यक्ष रहें फिर इसी विश्वविद्यालय के तीन वार फुलपति निर्वाचित हुए। श्राप के फार्य-फाल में इस विश्वविद्यालय ने कितनी उन्नति को, सव जानते हूँ इस फे झननन्‍्तर फाशी-हिन्दू विश्वविद्यालय फे भी श्राप फुलपति रहे। उत्तर प्रदेश तया विहार फे जनसेवा-श्रायोग के पाप भ्रव्यक्ष भी रहे रहन-सहन पहले अंग्रेजी ढंग फा था। पता था कि इस ऊपरी प्रग्नेजी वातावरण में भारतीय सस्कृति श्रौर राष्ट्रीयता इतनी भरी है! जव हिन्दी के मुकावले हिल्ुस्तानीं (उट्--हिन्दो) फो भारत फो राष्ट्रभाषा बनाने फा प्रान्दोलन जोर से चला, तो प्रयाग-विश्दविद्यालय के डॉ० ताराचन्द ने खुल फर इस का समर्यन फिया--लेसों फा ताँता बाँच दिया सभी विश्वविद्यालयों पर और 'शिक्षिता जनों पर श्रत्तर पडा--लोग ढुलमुलानें लगे ! डॉ० त्ताराचन्द फा प्रभाव ही ऐसा था। एस समय उों० ध्रमरनाय ज्ञा फी वह चौज सामने ध्ाई, जो रिवय-हप में उन्हें श्रपने महान्‌ पिता से प्राप्त हुई यी। इस समय डॉ० प्रमरनाय झा ने फलम उठाई श्रोर श्षपने झ्ोजस्वी लेसों से डॉ० त्ाराचन्द फो चित फर दिया | हिन्दुस्तानी फे नह॒ले पर हिन्दी फा यह दहला ऐसा पडा

१२ साहित्यिको के पत्र

फि क्‍या पूछो ! पासा पलट गया। लोग पुन हिन्दी पर दृढ़ हो गए।

ठीक इसी समय हिन्दी साहित्यन्सम्भेलन' के श्रवोहर-प्रधिवेशन फे सभापति फा चुनाव सामने श्रा गया। महात्मा गान्वी से हिन्दी फो वहुत बल मिला था श्रौर राजपि श्री पुयपोत्तमदास टडन उन्हें सम्मेलन में ले श्राए थे। सम्मेलन के दो बार श्रध्यक्ष भी महात्माजी निर्वाचित हुए श्ौर हिन्दी फा पूब समर्यन किया ; परन्तु बाद में मुसलमान साथियों फा कुछ ऐसा प्रभाव पडा फि वे हिन्दुस्तानी' फे समर्यक हो गए थे। यह वही हिन्दुस्तानी थी, जिस का समर्थन उस से बहुत पहले राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द' ने फिया था श्रीर भारतेन्दु वाव्‌ हरिश्चन्द्र श्रादि से जिसका विरोध कर के हिन्दी के पर हिन्द में जमाए रखें थे

सम्मेलन फा प्रभाव या। महात्माजी ने श्रपना प्रतिनिधि बना कर डॉ० राजेंद्ध प्रसादजी फा नाम प्रस्तावित कराया डॉ० राजेन्द्र प्रसाद साधारण व्यक्ति नहों--महान्‌ नेता ! श्रौर इस से पहले वे एक बार सम्मेलन! फी श्रौर एक वार फकाग्रेस' फी प्रव्यक्षा कर भी चुके थे। फिर, महात्माजी फा समर्थन ! पर चुनाव तो हिन्दी-हिन्दुस्तानी में से एक का करना था! हिन्दी वालो ने डॉ० झमरनाय झा का नाम प्रस्तावित किया और चुनाव में डॉ० झा विजयो रहे! हिन्दी को जीत हुई। इस के बाद महात्माजी ने हिन्दुस्तानी प्रचार-सभा' श्रलग वना ली थी

बस, यहाँ से डॉ० श्रमरनाथ झा का ऊपरी वेश-विन्यास बदला। कुर्ता-घोती भी उन पर खूब फवती थी

पं० जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी

जगजायप्रताद बह गछेघुर (ुंगेर

“नै ए7,0 5॥090प7 ४०७ (0०गह्टा।प्ा )

मित्ी>7/7 2396 ६६२

साहित्यिको के पत्र

पं० जगन्नायप्रसाद चतुर्वेदी चर्द जिन्दादिल साहित्यिक थे हास्य 'रस तो घतुवेदियों फो घूंदी में ही शायद पिला दिया जाता है। फोई-कोई (प० बनारसी दास चतुर्वेदी ज॑से) व्यक्ति प्रपवाद में मिलें गे श्रौर सचमुच चतुर्वेदी फे लिए यह एक भारी भअ्रपवाद' है कि चतुर्वेदी हो फर भी ये बसे नहीं परन्तु जो हास्य रस लिखते नहीं, थे स्वय हास्य रस बन जाते हूं! प० वनारसी दास चतुर्वेदी जब एम० पी०' हो गए, तो नई दिल्‍ली फे €€ नारे एवेन्यू” में म॑ उन से मिलने गया।

कुर्ता उत्तारे, पाजामा पहने, जनेऊ-विहीन, लवब-घडग, दूटा दाँत सामने दिखाते हुए चतुर्देदी ने जो स्वागत किया, तो मेरे मन की फली खिल उठी फिर वे अपने वरडे-वर्ड बक्सो में भरी साहित्यिक इतिहास फी चीजें जब दिखाने फो उठे श्रीर नीचे सरकता हुआ पाजामा शझपने एक हाथ से बार-बार ऊपर खसकाते हुए जब उस सामग्री के दिखाने-वताने सें विभोर हो रहे थे, तव फोटो उतारने लायक थे ! प० श्रीनारायण चतुर्वेदी रहते बहुत कंड से हे, पर चीजें फंसी गुदगुदान वालो देते हे भौर इस गुदगुदाने में कहीं जरा भी अभ्रइलीलता नहीं रहती श्री विनोद शर्मा झभिनन्दन ग्रन्या कैसा दिया है ?

खैर, में प० जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी के बारे में कुछ कह रहा था। श्राप फलकत्ते के व्यापार-ब्यदसाय की शुष्कता से सुखी लक्ष्मी निकाल कर साहित्यिक रस लेते थे। जब स्वर्गोय बाव बालमुकुन्द गुप्त ने प्राचार्य प० भहावीर प्रसाद द्विवेदी से हिन्दी-शब्दों पर विचार-चर्चा छोेंडी श्रौर समुद्र-मन्थन हुआ, तो चतुर्वेदीजी ने गुप्तनी का साथ दिया था। सम्मेलन के श्रध्यक्ष भी ऋप चुने गए। मेने यह देख कि श्रध्यक्ष वन चुकने फे बाद लोग 'सम्मेलन' में जाना बन्द फर देते थे---राजधि टडन की त्तो बात ही दूसरी है। ये तो सम्मेलन के प्राण ही ठहरे। पर झौर फिसी को मेने नहीं देखा कि झ्रध्यक्षता फरने के बाद भी, साधारण प्रतिनिधि के रूप में, सम्मेलन में पहुंचता हो एफ प० जगन्नायप्रसाद चतुर्वेदी

साहित्यिको के पत्र श्र

ही इस के प्रपवाद ये। प्राय' सभी भ्रधिदेशनों पर दर्शन देते थे ; पर वाद-विदाद से परे रहते थे।

मेने पहले-पहल सम्मेलन! के स्वालियर-पअधिवेशन पर दर्शन किए राद राजा ५० श्यामविहारी मिश्र श्रध्यक्ष थे। दात-दात पर 'राज- नीति से चौंकते ये। हिन्दी फा समर्यत मिश्रवन्धुओं ने उस समय (सरफारी उच्च अधिकारी होते हुए भी) फिया था, जब इस कौ फोई पूछपदोर थी। पर “राय बहादुर थे। अ्रधिवेशन में कुछ रस नमिल रहाया। पर चतुर्वेदीजी ने सद नीरसता दूर कर दी। बोले- श्राप फो में श्रपना साहित्यिक उत्तराधिकारी नियुक्त फरता हूँ / मेने फहा--यह्‌ उत्तराधिकार कंसा ? में हास्य-रस से फोसों दूर हें बोले--ध्राप चुटकियाँ बडी मजेदार लेते हैँ इसी लिए मेरे उत्तरा- घिफारी

इस भ्रधिवेशन पर श्री सुभद्राकुमारी चौहान फो 'सम्मेलन' ने पारि- तोधिफ देकर सम्मानित किया था। पतुर्वेदीजी ने फहा---ज़गश्नाय शोर सुभद्रा के एक साथ दर्शन लोगो फो कितने सुखद हों गे ।'

सम्मेलन! के सस्मरण प्रयाग के एक साप्ताहिकक पत्र में किसी विश्वमोहन एम० ए०' ने लिखें और लिया फि 'प० जगन्नायप्रसाद जैसे खूसद सम्मेलन में जाया फरें, तो श्रच्छा ! जब “जगन्नाय' फे साथ 'ुमद्रा का नाम चतुर्देदी ने लिया, तो श्री सुभद्राकुमारी चौहान लज्जा से जमीन में गड गई थीं (”

इस एम० ए० को में ने बहुत फटकफारा भौर बताया (उसी प्रयागीय पत्र में) कि जगन्नाय (कृष्ण) फी वहन हूँ सुभद्रा। विश्वमोहन ने यया समझ लिया ? भाई और वहन साय-साथ बेंढें ? उस उजड़ु ने चतुर्वेदीजी फो 'खूसद! फहने फी घृष्ठता फो है !' "शा घतुवंदोजी इस के बाद सम्मेलन में शायद ही फभी गए हो श्रीर

2 फा नाम तो मे ने उस के बाद कहीं देखा ही नहीं !

कप जारमलयाय2रयाक पपरसम्यपापका फसक

आदरणीय प्‌० सकलनारायण शर्मा

साहित्यिकी के पत्र १७

ग्रादरणीय पं० सकलनारायण दर्मा आरा (विहार) के निवासी थे पाण्डेय श्री रामावतार शर्मा, डा० फाशीप्रसाद जायसवाल, डा० सच्चिदा- नन्‍द सिह, श्रीयुत खुदावए्ा श्ादि उन सस्मरणीय सारस्वत सपृतों में प० सफलनारायण शर्मा हूँ, जिन से विहार गौरवान्वित हुआ है डा० राजेद्ध प्रसाद तो हे ही। श्राप फा नाम में ने जान-यूझ फर ऊपर फे लोगो में नहों लिया है।

पं० सफलनारायण शर्मा संस्कृत फे महान्‌ विद्वान थे शौर राष्ट्रभापा हिन्दी फे समर्यफ थे। पटना से शिक्षा नास फो सासिक पतन्निका निका- लते थं। तिकडमी थे नहीं, भ्रग्रेजी राज था, हिन्दी फी कौड़ी उठती थी। अन्तत शिक्षा छोड फलकततें श्राप चले गए , पर शिक्षा उन्हें फंसे छोडती ? बहू तो उन फी जन्स-सगिनी थी। फलकत्तें में झाप ध्रध्यापन फरने लगे।

सन्‌ १६३४ में सरकार ने पश्लाप फी विद्वत्ता फा सम्मान किया--- 'महामहोपाष्याय' फे पद से विभूषित फिया। मे ने इस अभ्रवसर पर पअभिवादन-पत्र भेजा था। उसी के उत्तर में पडित जी का यह फार्ड झाया था।

प० सझलनारायण शर्मा घनिष्य मित्र ये प॑० पर्मासह शर्मा फे शौर प० पद्मसिह शर्मा फे कैसे प्रभिन मित्र प॑० भीमसेन शर्मा थे, यह तो उन फे सस्मरणों से ही प्रफट है। प० भीमसेन शर्मा ज्वालापुर महाविद्यालय में (पं० पद्मसिहु शर्मा फे साथ) अ्रष्यापफ थे। फदाचित्‌ पं० सकलनारायण शर्मा भी वहां फुण दिन रहें हो--पं० नरदेव शास्त्री बता सयते हे

प० सकलनारायण दर्मा--जेसे जाने फितने सहान पुरुष हिन्दी फे इस महाप्रासाद फो नींव में भ्रज्ञात प्रस्तर-सण्ड घने पडे है! नमस्कार !

सेठ कन्हैयालाल जी पोह्दार

साहित्यिको के पत्र १६

सेठ फन्‍्हैया लाल जी पोह्दार श्रत्यन्त विनम्न प्रकृति के त्ात्विक व्यक्ति थे। पक्के सनातनी थे और पूर्वजों फे सम्मान फो तनिक भी घबका लगना उन्हें श्रसह्म था; यहाँ तक फि साहित्य के श्राचार्य मम्मट श्रादि फे फिसी विचार फा खण्डन भी उन्हें विचलित कर देता था ! कई वार मेरे मुंह से दंसी बातें सुव फर वे नाराज हो जाते थे ; पर वह नाराजी भी हँस कर ही प्रकट फरते थे सेठ जी फो लेख श्रादि लिसने के लिए श्ाचार्य द्विवेदी ने श्रामश्रित फिया था, सरस्वती फा सम्पादन-भार सेंभालते ही। उस समय सेठ जी प्राय' कविताएँ ही लिखा फरते थे--त्रजभाषा में विषय नवीन दुढते थे। बबई के समुद्र का वर्णन एफ फविता में किया था, जिसे मेने देखा है। रूभी का साहित्यिक जीवन प्राय फविता या कया--फहानी से ही प्रारम्भ होता है। श्रामें चल कर जब क्षिसी विशेष विषय में परिपक्वता पश्राती है, तव घारा गंभीर हो चलती है। सेठ जी ने भी ग्रागं चल फर रस--श्रतलफार के विवेचन पर ध्यात दिया। श्वाप ने मेघदूत' पर भी श्रच्छा फाम किया है; परन्तु 'काब्य-फल्पद्ुम ने बहुत श्रधिफ सम्मान तया प्रसार प्राप्त किया। फरमी-फर्ी शास्त्रार्यो सप भी श्राप फा प्रफट होता था। सीपी (सी० पी०, उक्त समय फे मध्य-प्रदेश ) फे मोती, राय बहादुर वावजगन्नाव प्रसाद भानु' के 'फाव्य-प्रभाफर' का सण्डन बड़े जोर से सेठ जी ने कर दिया था। भानु जी फा प्रसली विषय छन्दशास्‍त्त्र था--हिन्दी के दे पिड्धला- घाय॑ ही यें। बडी प्रतिभा थी। उच्च सरफारी श्रधिफारो हो फर भी नानु जी तया मिश्रवन्युओ ने उस समय हिन्दी फी झोर मुख फिया, जब एस की फोई दर-कदर यी ! इन लोगों फी देखा-देसी दूसरे भी इधर मुड। शभानु जी ने छन्दन्शास्त् पर जो फाम कर दिया, उस से झाग हिन्दी में पोई जा नहीं सका है शौर उन से पहले ही फिसी से बह फ्राम ने बने पडा था। में एक बार भानु' जी से मिलने गया--सन्‌ १६२५ फो, या उस के पुछ इधर-उपर की वात हैं। सेठ जो 'फाध्य

२० साहित्यिकों के पत्र

प्रभाफरा फी धज्जी उडा चुफे थे। बीडी हरदम पीते रहते थे, जसे डा० ध्यामसुन्दर दास जी हुबका ! मे ने बात-चीत में पोहार जी का जिक किया--काव्य-प्रभाकर' फी श्रालोचना फी चर्चा फी। भानु' जी का यहू मुरय विषय था, इस लिए फुछविशेष न॑ फहु फर बोले-- पोद्दार जी ब्राह्मण-सेवी हू , सब फाम उन के बन जाते है ! !

भानु जो कवि थे ! में ने व्यजना जो समझी, श्रागें चलकर गलत निकली में ने समझा फि पोहार जी पढितों की सेवा फर के लिखा लेते है श्नौर श्रपने नाम से छपाते हें !

इस यात्रा से घर वापस पश्राफर हिन्दी फी सभी (प्रचलित) श्रलकार झ्रौर रस की पुस्तकों को श्रालोचना की, 'काव्यकल्पदुर्मा की भी। 'काव्य-फल्पद्ुर्मा के सबन्ध में यही लिखा था कि उदाहरण सस्छ्ृत से श्रनु- वाद कर के देने से विरसता श्रा गई है, बस ! फहीं-फहीं लक्षण श्रादि पर भी छींठ थे और श्रन्त में यह भी लिख दिया था कि सेठ जी ब्राह्मण- सेवी है , सव काम वन जाते हें !

सेठ जी ने माधुरी' में ही उत्तर छपाया। मे ने प्रत्युत्तर दिया ; चुप हो गया! कई वर्ष वाद उन का पत्र झ्राया--फाव्य-कल्पदुम' का झगला सस्करण तयार हो रहा है। इसे देख लीजिए। पहले देख लेना श्रच्छा है। यहाँ (मथुरा) शा कर महीना-पद्बह दिन रहिए ।' में गया और तब विचार -मन्यन में उन का इस विषय फा पाण्डित्य देखा चलते समय, जब मे टाँगे पर बैठ गया, बोले--वाजपेयी जी, श्राप को यह वात फंसी है?” मे ने पूछा--कौन सी ?” बोले--ब्नाह्मण- सेवी! वाली। '्राह्मण-सेवी तो श्राप हे ही !” “नहीं, जो व्यजना भाप ने की थी बह तो गलत निकली। हाथ जोड फर बोले--तो फिर उस का निराकरण होना चाहिए मे ने स्वीकार किया औ्रौर माधुरी में ही भ्रपने क्रम का सशोधन छपवा दिया

स्वर्गीय पं० सिद्धधाथ माघव आगरकर

776 मांऊक 8 एक ए&.

(सख्पबतह संव एटथ४३ )

(हिन्दी ्यराष्प (प्च4भए0फ्त&

20020 .०- (८2--985

म्ियोश7एयॉणी / ४० 3० 2/4-. 5 टीभॉ२० (9 ््ग्र] हि धर

(भरे 'शभी 5) #भी ॥४४ पक ब्प्( 4५-(१५)4 के &गभी नलवेध/ “6/४ सिहर (थम) (८रो(र। 2 गवे) 2 व्योर पट टेये देगा ठ) सेठी (2भ: हट पेोष्थाए हरि प्र) २) ध्ट "३८ थदे ८४ (घर हिन्ड़ो प्र तह (४7६87 -शुख्डि् (ने 3४ दीह/% 4 भै/ #पशय+८ शत 6तफ्िए 4 व्द्पपे(५ भ्शू (है! शा? (77 हे कक 288 ट्र उप चर

2 , 4 काव्य] किट "(तह हक 4) €ए>ए “॥/प॑न्वी आर #मी कीलीब। नि % |

ही

२२ साहित्यिको के पत्र

हिन्दी श्रीर स्वराज्य श्रान्दोलन के तेजस्वी श्रौर सातक्त्विक नेता प० सिद्धनाय माघव पश्रागरकर 'खड़वा' (म० प्र०) से हिन्दी-स्वराज्य! साप्ताहिक पत्र निकालते थे। यह पत्र बरावर मेरे पास श्राता था। इस में साहित्यिक टिप्पणियाँ श्री विनय मोहन झार्मा लिसा फरते थे सामने मुलाकात थी, पर मेरा हृदय भाई प्रागयरफर के हृदय से मिल गया था।

सामने दश्शन फेवल एक बार हो हुए--दिल्ली में “हिन्दी पत्रकार- सम्मेलन! था। जहाँ तक याद पडता है, श्रागरकर जी फोई पदाधिकारो थे। श्रध्यक्ष थे श्री हरिशकर “विद्यार्यी--कफानपुर के 'प्रताप॑--- सम्पादक विचार-विमर्श पर किसी वात से से नाराज हो गया, और उठ फर चला गया, अपने श्रासन पर लेट रहा ! भाई शआागरकर जी पीछे ही पीछे श्राए श्रौर इस तरह मनाया कि जैसे इन के लडके फी बरात रुकी हो, एक बुजुर्ग फो बरातत में चलने फे लिए मनाने में ! में सम्मेलन को तो कुछ समझता था, पर शझ्रागरकर जी फो समझा ! बिल्ली की तरह उठ कर चला गया | उस सम्मेलन में सव से श्रधिक लाभ मुझे यही हुआ--श्रागरकर जी के दर्शन

सन्‌ १६३८-३६ की बात है, में नोकरो से बर्खास्त कर दिया गया ! समाचार छपा, तो आ्रागरकर जी ने पत्र भेजा और लिखा फि श्राप अपनी पुस्तक शझ्रादि का विज्ञापन हिन्दी स्वराज्य' में चाहे जब तक छपा सकते

साहित्यिको के पत्र २३

है--आाप का पत्र है। में इस समय श्राप की यहू सेवा फरना चाहता हूँ ऐसा ही पत्र सैनिक! फे सचातक-सम्पादक पं० भ्रोकृष्णदत्त पालीचाल फा श्राया था। तब तक मेरी कोई पुस्तक तो ७पी ही नहीं यो--पत्र पत्रिकाओं में छुपे लेखों के फारण ही प्रसिद्धि थी। विज्ञापन कया छपाता | सोचा फि हिमालय फी चीजें (शिलाजीत, बाह्मी श्रादि) वाहर भेजने का काम फिया जाए। इस के लिए हिमालय एजेंसी' फे नाम से सैनिक तथा हिन्दी स्वराज्य' में विज्ञापन पाने लगा। लोग शिलाजीत श्रादि मेंगाने लगे फुछ फाम चला ; पर इसी प्रर्से में फाग्रेस सरफार ने मेरी झ्रपोल सुन ली झौर में पुत अपने फाम पर पहुँच गया--प्रध्यापन फरने लगा। तब भाई प्रागरकर फो पत्र लिख कर मना फिया फि प्रव विज्ञापन छापने को जरूरत नहों है--न छापिए। तब विज्ञापन छपना चन्द हुआ। सनिक' ने स्वत' छापना बन्द फर दिया था।

सो, भाई प्रागरफर जी में ऐसी श्रात्मीयता भी यी। से ने हिमालय एजेंसी! फा काम बन्द फर के अच्छा फिया। फाग्रेसी मप्निमदल ने ज्यो ही त्यागपत्र दिया, मुझे फिर बर्खास्त कर दिया गया इस वार म॑ ने धोदा-सा प्रेंस खरीद कर चलाना शुरू किया, जो मेरे लिए प्रेत वन गया-- मुझ ही पाने लगा! प्रनुभव था नहों। इधर सरफार नें प्रेस-ऐफ्ट में मुफदमा चता दिया। बडी झन्नदो में पडा। काम पश्राता था, सो ध्रपना ही लिणा छपाने लगा ! _द्वापर की राज्य-फरान्ति'! या 'सुदामा' (नाटफ ) भ्रौरलेपन-फला' छपी प्रफाशक, हिमालय एजेंसी! लिख दिया। प्रेस फा नाम भागीरयी प्रेस! था। यो हिमालय एजेंसी' की फया है जिस फा नाम ध्रच्छी हिन्दी' झौर 'सस्कृति फे पाच ध्रव्याय' घ्रादि फे फारण हिन्दी-जगत्‌ में प्रनन्त फाल तक रहे गा। इस 'एजेंसी' फा सबन्ध यो भाई प्रागरफर जो से है। थे श्राज भी मेरे हृदय में उसी तरह है भोौर सदा रहेंगे। पत्र में गगा फऐ लेस का उल्लेष है। में ने अपने जीवन फे प्रारम्भ फो (प्राय १६१० से १६१८ तक को) चर्चा फी थी।

श्री रामदास गोड़

साहित्यिको के पत्र २५

धरी रामदास गीड का गौरवमय नाम में सन्‌ १९१६ से हो सुनता प्रा रहा था। घे प्रयाग में विज्ञान फे प्राष्यापक ये और महात्मा गान्वोी के ग्रसहयोग-प्रन्दोलन में सरकारी नौकरों छोड कर धघलग हो गए थे। 'रामचरित्त-मानस फा मनन झौर चरखें का फातना--'रामदास गौर्दा श्राग उनन्‍्हों ने बडो गरोबों फा जीवन विताया ! कुटुव के भरण-पोषण तक फी चिन्ता ! संच बात तो यह है कि प्रध्यापकों से सरकारी नौकर छुट्वाना कोई प्रसहयोग था! सरकार फा इस से कया बिगड़ा वह तो चाहती ही थी फि राष्ट्रीय प्रवृत्ति फे लोग शिक्षा-सस्याग्रों से जाएँ, तो ध्रच्चा , नहों तो ये छात्रो फो भी श्रपना जैसा बना दें से सचमुच राष्ट्रीय प्रवृत्ति के प्रच्यापक जहां से हू, वहाँ घोर गुर पहुँच कर भ्रराप्ट्रीय भावनाएँ छात्रों में भरने लगे थे पुलिस, अऋद शध्रोर सेना से श्रदूहुयोग फरवाना पा सो फुछ हुआ श्रौर एफ मोतलाना सुहस्भद प्रतो ने फहु दिया कि एिलाफल का सससा हल फे लिए एर-एफ मुसलमान को प्रग्रेजो सरफार फी फौज से हद

२६ साहित्यिकों के पत्र

चाहिए , तो तत्कालीन वायसराय के कहने पर महात्मा जी ने मौलाना से माफी मेंगवाई ! तो, फिर श्रध्यापफ नौफरी छोड फर फौन- सा सरफारी फाम रोक सकते थे ? हाँ, श्रध्यापको में भावुफता होती है भोर श्रन्य विभागों की तरह कठमुल्लापन या गुलमटापन कम होता है सो, बहुत से श्रध्यापक सरकार से 'श्रसहयोग' करके योगी--प्रवघृत वन गए थे। उन में से श्रधिकाश के दिन बुरे बीते ! पर फिर भी वे अ्रपनी श्रान पर डटे रहे। श्री रामदास गौड ऐसे लोगो में श्रप्नणी थे

सन्‌ १६२७-२८ फी वात है, गुरुकुल-विश्वविद्यालय (कागडी) ने गोड जी को श्रपने यहाँ बुला लिया बहुत थोडे वेतन पर चले गए थे-- जरूरत थी ! हरिद्वार फा प्राकर्षण भी या। तब गगा जी के उस पार (कागडी में) यह “विश्वविद्यालय/ था। मे भी हरिद्वार पहुँच गया श्रौर जब यह मालूम हुआ कि गीड जी शझ्लाज-कल गुरुकुल में हे, तो में उन से मिलने गया ज्वालापुर के गुरुकुल-महाविद्यालय के श्राचार्य मित्रवर प० हरिदत्त शास्त्री फा साथ था। बगुरुकुल में पहुँचने पर घटे-घडियाल फी शोर शख की ध्वनि सुनाई दी। श्रचरज की वात थी ! पुष्ने पर मालूम हुआ कि गोड जी के यहाँ इसी तरह नित्य पूजा-प्रारती होती है

हम लोग पहुँचे। 'सत्यनारायण्ण फी फथा थी। प्रसाद लिया। बातें हुई भौर बस !

कुछ दिन वश्द गौड़ जो श्रपना सामान लदाए सकुटुम्व कनखल आए, अ्रावाज दी। मिलने पर कहा--'काशी जा रहा हैं पानी पिलाझो में ने गुरुकुल में पानी पीता भी उचित नहीं समझा !” पानी ही पी फर स्टेशन चले गए। बाद में भाई प० हरिदत्त शास्त्री से सब रहस्य मालूम हुआ वे उन से श्रग्नेजी पढ़ा फरते थे। मालूम हुआ कि गौड जी के 'लेबोरेटरी असिस्टेंट! फो गुरुकुल के उपाचार्य श्री विश्वनाय जी ने फिसी फास से बुल लिया था। गौड़ जी शझ्ाए श्र लेबोरेटरोी में फिसो फो न॑ देख झलला उठे। मामला बढठा। श्री विश्वनाथ जी ने कहा कि से उधथाचाये हूं, लेबोरेटरी श्रसिस्टेंट को बुला सकता हूँ गौड जी फा कहना

साहित्यिको के पतश्र २७

था कि लेबोरेटरी फो यो नहों छोड़ा जा सकता है भौर मेरे प्रसिस्टेंट फो मेरी श्रनुमति के विना कहों जाना चाहिए। गुग्कुल फे श्रधिफारी प्रपनो बात पर प्रडे रहे श्रौर इसो पर गोड जी वहाँ से तुरन्त उसी तरह चल पड़े |

में गोड जो के रहन-सहुन से तया गीड' शब्द से उन्हें ब्राह्मण समज्ता फरता था। ब्राह्मण तो वे थे ही, पर जन्मना फायस्य थये। फाशी में फायस्थों का एक वर्ग गोड' भी है। अ्रचरज फी बात है कि बह महान्‌ वेज्ञानिक भृत-प्रेतों में पुरा विश्वास करता था! '"प्रणम्याः खलु सन्त '।

आचाये पं० अम्बिका प्रसाद वाजपेयी

साहित्यिको के पत्र २६

प्राचार्प प८ प्रम्विका प्रसाद वाजपेयपों हिन्दी के उन भहान्‌ प्रपितामहों में है, जिन के सतत प्रध्यवसाय से हिन्दी वस्तुत हिन्दी बनी सोनाग्य से श्राज भी भ्राप हमारे बीच में हें श्ौर हमारा पय-प्रदर्शन फर रहें हूं। श्राप हिन्दी फी यह चौथी पीढ़ी अपने सामने देस रहे है , इस लिए विगत रुत्तर वर्षों फे इतिहास फी श्राप प्राणवन्त सूत्ति है

वाजपेयी जी राजनीति में लोकमान्य ठिलक फे प्रन॒यायी हें। सम्पादन-कला के तो आराप प्राचायं हूं ही; दो विपय श्राप के प्रिय हूं, जिन पर रादा लिपते रहें हे, भाज भी लिप रहे --१--राजनीति श्रौर २--हिन्दोपाफरण

वाजऐपी जी झफेले ही चलने वाले फेसरी हूं। जब प्राचार्य द्विदेदी ने भाषा-शुद्धि तथा ध्याकरण पर बहुत जोर दिया और उस के परिणाम- स्थवाप नागरी-प्रचारिणी सभा (काशी ) ने हिन्दी का एक प्रामाणिक झौर

३० साहित्यिको के पत्र

पूर्ण व्याफरण लिखवाने का उद्योग किया, तो हिन्दी-व्याफरण समिति पथ-प्रदर्शन तथा परीक्षण के लिए बनी श्रौर प० फामता प्रसाद गुर को हिन्दी-व्याकरण लिखने फा फाम सोंपा गया। प० श्रम्बिका प्रसाद चाजपेयी को भी व्याफरण-समित्ति में रखा गया श्रौर प० गोविन्दनारायण मिश्र (फलकत्ता) फो भी। उन दिनो वाजपेयी जी भी कलकत्ते ही रहते थे। प्राचार्य द्विवेदी व्याकरण-समिति में प्रमुस थे। सदस्यों में प० रामचन्द्र शुक्ल जंसे श्रन्य साहित्यिक भी थे।

ऐसा लगता है कि वाजपेयी जी ने श्रनुभव किया कि व्याकरण यो ठीक बने गा श्रौर बन जाने पर कहाँ-कहाँ,क्या-नया चीज देसी-समझी जाए गी | झौर फिर विवाद फर फे सशोधन करना-फराना भी एक पझमेला सो, उन्होने स्वतत्र रूप से हिन्दी फा व्याकरण लिखना शुरू कर दिया। सोचा हो गा, दो चीजें सामने श्रा जाएँ गी, तो जिस में जो चीज ठीक हो गी, मान ली जाए गी। दोनो व्याकरण एक दूसरे के पुरक भी हो सकते थे। फाम में लग गए और गुर जी का 'हिन्दी-व्याकरण' समिति की जिस बंठक में परीक्षित होने को था (वृहस्पतिवार, श्राश्विन शु० सवत्‌ १६१७ तदनुसार ता० १४ पझ्क्‍ट्वर १६१२० को) वाजपेयों जी तथा प० गोविन्द प्रसाद मिश्र उपस्थित नहीं हुए थे।

गुर जी का, हिन्दी-व्याकरण' श्रभी प्रकाशित भी हो पाया था कि वाजपेयी जी का व्‌ ह॒द्‌ हिन्दी-व्याकरण ('हिन्दी-कौमुदी' ) प्रकाशित हो कर सामने भरा गया | गुर्दा जी ने श्रपने हिन्दी-व्याफरण की भूमिका में लिखा है--“हिन्दी-कौमुदी' श्रन्यान्य सभी व्याकरणो की श्रपेक्षा श्रधिक व्यापक, प्रामाणिक श्रौर शुद्ध है ।”

१६४३ में न्नजभाषा फा व्याकरण सेरा निकला। उस की भूमिका में मने प्रचलित व्याफरणों फी श्रालोचना की इस फी एफ प्रति गुरु जी फो 'रजिस्टरी पेकेट से भेजी और एक वाजपेयी जी को “गुर जी ने तो प्राप्ति-सूचना भी दो , पर वाजपेयी जी ने खुल कर फहा--- इस पुस्तक का भूमिका-भाग हिन्दी के व्याकरणो का व्याकरण है।

साहित्यिको के पत्र ३१

यही स्पप्ठता श्राचार्य द्विवेदी में यो। वाच्य-विवेचन जब मे कर रहा या, तुरन्त मेरे विचारो पर प्रश्नत्यक्ष-€प से श्रपनोी मुहर लगा दी थी झ्रौर स्वनिर्देशित तया प्रमाणी-कृत '(हिन्दी-व्याकरण' की गलती मान ली थो।

पत्न में 'मरालो फा जिक्र है। में इस पन्न फा सम्पादक था श्रौर डा० ध्यामसुन्दर दीक्षित सहफारी सम्पादक थे। नीर-क्षीर फो श्रतग- ग्रलग फरता था--सराल। श्री गुलाव राय एम० ए० फे नव रस फो झालोचना फी गई यो श्रौर फहा गया था कि यह विषय मूलत' सस्कृत में है, भ्रप्रेजी में नहों ; इसी लिए बाबू गुलाब राय गडवडाए है ! फोई चीज श्रग्रेजी साहित्य से ला फर देते, तो बहुत श्रच्छी रहती

महामहोपाध्याय पं० गिरधर शर्मा चतुर्वेदी

साहित्यिको के पत्र डरे

महामहोपाध्याय प० गिरवर शर्मा चतुर्देदी तस्क्ृत साहित्य के प्रयाघ समुद्र हे भारतवर्ष में चार-पाँच ही ऐसे विद्वान्‌ मिलें गे, झौर ये भी जा रहे हूँ, जाने वाले है ! इन के बाद सस्कृत फे गहन विषयों का गहरा पाण्उित्य समाप्त हो जाए गा पूर्वजों ने सस्छृत में जो साहित्य दिया है, उसे ठोक- ठीक समझ सकते वाले भी फहों मिलें में ! मुसलमानी शासन-फाल में उस निधि फी रक्षा तपस्वी प्राह्मणो ने कर ली, श्रग्रेजी राज में भी उसे गले लगाए रजा; पर शअ्रव श्रपने राज में प्रपना' सपहित्य फंसे बचे ! महान्‌ प्रन्यो फा श्रालोडन फरने वाले मन्दराचल श्रव मिलें में

करी सतुर्देदी जो फा नाम में ने सन्‌ १६१५-१६ में ही सुन लिया था, जब फे ऋषिफुल (हरिद्वार) में प्रधान प्रध्यापफ थे चहां से ब्रह्मचारी' नाम पग एक सामिक पन्न भी निफलता था। इस पत्र में में श्री चत॒वेंदो जी फे यिचार पट्टा करता था। फिर लाहवीर में (सन्‌ १६१८ में) उन फे दर्शन पिए, जब मे वहाँ 'सवातनपर्म सस्कृत-महाविद्यालय! के श्ाचाय॑ थे। उन में मेरी श्रद्धा वरावर बदतों ही गई।

है

३४ साहित्यिकों के पत्र

उन दिनों चतुर्वेदी जी हिन्दी के पूरे सम्पर्क में थे, जब सस्कृत के पण्डित हिन्दी-पुस्तकों को भाखा फह फर फंक देते थे! में ने चतुर्वेदी जी के मृंह से पुराने हिन्दी-कवियों फी सूफ्तियाँ सुनी हूं। चतुर्वेदी जी स्वर्गीय बाब वालमुकुन्द गुप्त की शली की बडी प्रशसा फरते हे। चतुर्वेदी जी के साथियो में ही प० शालग्राम शास्त्री-जंसे धुरन्धर हिन्दी के लेखक थे झ्ौर प० पद्मसिह शर्मा भी इसी गोल फे थें। प० पद्मसिह शर्मा श्रौर पं० शालग्राम शास्त्री भी सस्कृत फे महान्‌ विद्यान थें। प० शालग्राम शास्त्री तो अ० भा० सस्कृत-साहित्य-सम्मेलन फी श्रध्यक्षता भी फर चुके थे। परन्तु इन सस्कृत-पण्डितों फी चहकती हुई भाषा तो देखिए ! दिल फडक उठता है। सस्कृत जानने वाले लोग जा-वेजा सस्कृत के अ्रश्नचलित श्रौर दुर्वोध शब्द दे-दे फर (हिन्दी के विद्वान! फहलाने की सनक से) हिन्दी फो विकृत फर रहे हैं ! चतुर्वेदी जी जानदार हिन्दी के समर्थक है। पत्र में श्रपन हस्ताक्षर करने फे वाद जो शब्द चतुर्वेदी जी ने टिकट भेजने के सम्बन्ध में लिखें है, ध्यान देने योग्य हें। सस्कृत के पण्डितो में यह चीज कम मिलती है।

राष्ट्रकवि मंथिलीशरण गुप्त

चिरगॉव (समॉसी)

३६ साहित्यिको के पत्र

जब म॑ सस्कृत फा छात्र था, गुप्त जी फी भारत-भारती' प्रकाशित हुईे। बडी धूम थी। राण्ट्रीयता फा शोर भारतीय सस्क्ृति का शख- नाद समझ्िए। प्रवुद्ध तरणजन भारत-भारती' फी पपितयाँ गुन-गुनाते रहते थे। श्राचार्य द्विवेदी फी भावना उन के सुयोग्य शिष्य ने सवाक्‌ फर दी थी। उन दिनो हमारे प्रदेश में श्री गणशशडद्धूर “विद्यार्यी का प्रताप! था भ्रोर गुप्त जी की भारती थी। श्राचाय॑ं द्विवेदी के ये दो प्रमुख शिष्य राष्ट्रीयता का उद्धोष अपने-अपने ढंग से कर रहें थे। इसी समय म॑ भी गुप्त जी फी श्रोर उन्मुख हुझा

वर्शन बहुत दिन बाद फाशी में हुए, हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन फे अ्रधिवेशन पर इस अ्रधिवेशन पर श्रध्यक्ष थे पुज्य प० झ्म्बिका प्रसाद वाजपेयी श्राचार्य द्विवेदी का स्वर्गंवास हो चुका था। गुप्त जी अपनी लबो दाढी-मुछ साफ फराए हुए थे। सिर पर उस्तरा फिरा था, नहीं तो समझता कि श्राचार्य द्विवेदी के स्वगेंचास पर यह सब है ! उन का इमश्रुल चेहरा चित्रों में बहुत भ्रच्छा लगता था। परन्तु वे महात्मा गान्घी के उस सत्याग्रह में जल चले गए थे, जो (द्वितीय विव्वयुद्ध फे दिनो में सघषं छेडने के सतत श्ाग्रह पर) काग्रेस की प्रतिष्ठा फे लिए' महात्मा जी ने छडा था और श्रपनी स्वीकृति दे कर हो किसी फो सत्याग्रही बनने देते थे। ध्यान रहे, इस सत्याग्रह में भाग लेने की श्रनुमति (माँगने पर भी ) श्री सुभाषचन्द्र बोस फो महात्मा जी ने दी थी ! हमारे फनखल के स्वामी सत्यदेव परित्रजक को भी श्रनुमति मिली थी , पर स्वामी जी वोस थोड ही हें! सत्याग्रह कर दिया और जेल गए--श्राँखों से लाचार होने पर भी ! बोले--प्रच्छे कास में श्रनुमति की परवाह करनी चाहिए

खर, गुप्त जी फो पश्रनुमति मिली थी श्रोर जेल में ही उन्हो ने मूछ- दाढ़ी साफ फरा दी थी। दलिया जेल की बढ़िया होती है। उस के रसास्वाद में बाधा पडी हो गी--मूछु-दाढी में चिपट जाती हो गी। मुझे भी इस फा अनुभव है--जेल में सूछें बनवा दौ थीं; पर घर झाने पर

साहित्यिकों के पत्र ३७

घरनी वेहद नाराज हो गई--मूछें फहाँ गई !” फिर श्ला जाँए गो फह फर फिसो तरह समझाया !

फोई सन्‌ १६४०-४१ को बात है--में स्लाँसी गया। मेरी बड़ी लडकी (चि० सावित्री) वहाँ बहुत बीमार हो गई थी। मेरे चचेरे भाई प्ाांसी हो रहते हे--पं० गगाचरण चाजपेपी। तार पा फर मे धांती गया। चिरगाँवो समीप ही है। में ने एक कार्ड भेजा-- दर्शन फरने फी इच्छा है मतलब यह था फि फहीं बाहर गए हो, तो जा फर दया फरू | घर हो गे, तो जाऊँ गा। गुप्त जी ने पत्र फा उत्तर डाक द्वारा पत्र से नहों दिया, पझ्पने एक भतीजे को भेंजा। (नाम में भूल गया हैं) उनके भतीजे में चिनय हो गी, तो फिस में हो गी? घर पहुँच फर विनय-पूर्वक गुप्त जी फा पत्न मेरे हाय में दिया ; शुप्फ पत्र नहों, हरा-मरा। यानी कुछ नें भी गुप्त जी ने भेजी थी। ये राम-उपासक वर्णाश्रमी हें। पत्र सें लिखा था फि 'कई दिन से प्रस्वस्थ हैं। हो सके तो दर्शन झ्रवश्य दें। स्वस्थ होता, तो साँसी पग्राफर दर्शन फरता !” श्पने राष्ट्र-कवि फा यह स्नेह-सौजन्य मेरा परम सोभाग्य था। र्म दूसरे-तीसरे हो दिन चिरगाव गया। घर देख फर, पहले घर फा विश्ञाल फाटक ही देख फर, पता घल जाता है फि गुप्त जो एग धर चिरगाँव फा चिरप्रतिप्ठित मान-फेनद्र हे। दो-तीन दिन बढ़ा प्रानन्द रहा। वहाँ रह फर में ने प्नुमय फिया फि कविता में चाहे हों ; पर सौजन्य-शालीनता में उन के पनुज श्री सियाराम शरण गुप्त उन से फम नहीं, प्राय ही हूं। गुप्त जी फे प्रश्न तथा भतीजे भी वैसे हो मिले। गुप्त जो की सेरे ऊपर सदा फ्पा रही है, विचारों में भेद होने पर भी

पाण्डेय बेंचन शर्मा उद्र

हिन्दी पञ्ु॒ध्ग्य 8 दिनोव () समीक्षा & साहित्य

साहित्यिको के पत्र ३६

उग्र जो जब पहले-पहुल फलपाते में चमक रहे थे--निराला' जी फे साय मतयाता' फे पृष्ठो फो धागे बढा रहे ये, त्व से में जानता हूं उग्र जी, निराता जी, पन्‍्त जी, महादेवी जी प्रादि ने जब रू(हित्य में प्रदेश फिया, कुछ प्रागें-पीणे मेरा भी वही समय है। फहने फो तो सन्‌ १६१६ में मेरा पहला लेप 'ष्णय-सर्देत्व' में (दशा भषित॑ शीर्षक से निकला था, जिस मे पन्न फे सम्पादक (प० फिशोरीलाल गोस्वामी) बहुत प्रसन्न हुए थे; परन्तु मेरा वास्तथिक साहित्यिक जीवन १६१६ में शास्त्री हो जाने फे बाद शुरु हुआ। यही रूमय उग्र भ्रादि फा है

जब मतयाला' में उग्र जी फी फलम से चन्द हसीनों के सतृत्ता लिफल रहें थे, एक तूफान था! बाद में पुस्ठकाझार भो यह चीज निकली थी। प्रस्तत हिन्दून्सगठन उद्देयय था। मतवालां पत्र ऐसा निकला, जेसा ने फनी पहली निफता था, फिर बाद में गोई बेसा निकला! 'मततवाला' खुद भी बेसा रहा, जब फसरतसे ने मिर्जापुर उठ प्राया। याद में हिन्दू पर्चा निकाला सही, पर यह बात थी सहगल जो फे चाँद पे छाव मतदाला भी चेठ गया! सिरन्री-मारवाडी झमेतदा इन दोनो पर्यों को ले बेंठा ग्रौर विदवर्मिनत्रं चमफ गया !

४० साहित्यिको के पत्र

खेर, उग्र! जी फलकत्ते रहे। इधर बाबू रामानन्द घट्टोपाध्याय ने विशाल भारता निकाला। चट्टोपाध्याय जी प्रवासी भारतीयों पर बहुत ध्यान देते थे श्रोर प्रवासी-सेवा में श्रश्रणी प० तोताराम सनाढच फे सग से प० वनारसीदास चतुर्वेदी पर भी कुछ-फुछ बह रग चढ गया था चतुर्वेदी